मैंने प्रेम किया —
जैसे सूखे वृक्ष में फिर पत्ते फूटे,
हरियाली छाई हो मन के श्मशान पर।
मैंने चाहा —
तू मुझे स्पर्श कर ले,
जैसे मृत्यु से छीन लाऊँ जीवन।
पर तू आई नहीं।
मैंने प्रतीक्षा की —
खुद को भूखा रखा,
देह गलती रही,
मन कुंठित होकर भीतर ही भीतर
सड़ता रहा।
हृदय —
एक मृत बालक बन गया था,
जिसे मैंने गोदी में लेकर
हर रात थपकियाँ दीं।
तू नहीं लौटी।
अब प्रेम मेरा
गंधाता है,
कुचले हुए सपनों की दलदल में,
जहाँ कीड़े उगते हैं
तेरी स्मृति से —
जैसे कोई पवित्र मूर्ति
सड़ चुकी हो भीतर से।
मैं अब भी तुझे चाहता हूँ —
हाँ, उसी जले-सले तन से,
जिसे तू छोड़ चुकी है
भूत की तरह।
क्योंकि प्रेम...
शुद्ध नहीं होता सदा —
कभी वह विक्षिप्त भी होता है।
कभी वह
विभत्स भी होता है।
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