जिंदगी के फलसफे
घड़ते हैं रोज
कुछ डहते हैं
कुछ रह जाते हैं रोज
जिक्रे फलसफे
करना भी जरूरी है
सांसो का क्या भरोसा
घटती है रोज
फलक हरम में उनके
हराम है सुकून
वह गुस्ताखियां करते हैं रोज
अ जिन्दगी तेरा ख्याल हि
गुनाह हो गया हैं
अब तो मेरे लिए ,
जमाना
हसरत-ऐ -मासूक रखता है ,
यहाँ दिदार-ऐ-मासूक भी
मुमकिन नहीं
अब तो मेरे लिए...😢
चल अ जिन्दगी
कुछ और
हि फलसफे गढत़े हैं ,
जो अपने होने का
दम्भ भराते थे,
उन्होने तो
अपने तेवर दिखा ही दिये...!