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शनिवार, 19 जुलाई 2025

तेरे बग़ैर भी दिल को करार रहता है

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तेरे बग़ैर भी दिल को करार रहता है,
ये दर्द है कि कोई शहकार रहता है।

हम उनके दर से उठे भी तो इस अदब के साथ,
कि जैसे सज्दे में कोई इंकार रहता है।

मुलाक़ात की उम्मीद अब नहीं बाक़ी,
मगर निगाह में अब भी इंतज़ार रहता है।

हुस्न-ए-वफ़ा की उनसे न कोई तर्ज़ मिली,
हमारे इश्क़ में ही क्यों इख़्तियार रहता है?

जो बात दिल में थी, वो लफ़्ज़ों में आ न सकी,
ग़ज़ल में हर शेर अधूरा-सा-प्यार रहता है।

तू क्या गया कि आईना भी शर्मिंदा हुआ,
चेहरे पे अब भी तेरा असर बेशुमार रहता है।

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