शनिवार, 19 जुलाई 2025

"विकार"




मैंने प्रेम किया —
जैसे सूखे वृक्ष में फिर पत्ते फूटे,
हरियाली छाई हो मन के श्मशान पर।
मैंने चाहा —
तू मुझे स्पर्श कर ले,
जैसे मृत्यु से छीन लाऊँ जीवन।

पर तू आई नहीं।

मैंने प्रतीक्षा की —
खुद को भूखा रखा,
देह गलती रही,
मन कुंठित होकर भीतर ही भीतर
सड़ता रहा।

हृदय —
एक मृत बालक बन गया था,
जिसे मैंने गोदी में लेकर
हर रात थपकियाँ दीं।

तू नहीं लौटी।

अब प्रेम मेरा
गंधाता है,
कुचले हुए सपनों की दलदल में,
जहाँ कीड़े उगते हैं
तेरी स्मृति से —
जैसे कोई पवित्र मूर्ति
सड़ चुकी हो भीतर से।

मैं अब भी तुझे चाहता हूँ —
हाँ, उसी जले-सले तन से,
जिसे तू छोड़ चुकी है
भूत की तरह।

क्योंकि प्रेम...
शुद्ध नहीं होता सदा —
कभी वह विक्षिप्त भी होता है।
कभी वह
विभत्स भी होता है।




सोमवार, 23 दिसंबर 2024

वक्त

वक्त बड़ा अजीब है साहब यहां 
अपने ही अपनों को नीचा दिखा रहे हैं

जिन को चलना सिखाया था कभी 
वही हमें अब चलने की हकीकत समझा रहे हैं 

जिन के सिले थे हमने पजामे कई 
वही हमें अब  पेबंद लगाना सिखा रहे हैं


बुधवार, 17 मई 2023

गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

शायर

शायर होने के भी अपने तजुर्बे हैं दोस्तो 
हम शायर तो शायद ना हुए, बदनाम हो गए

हंसी

यह तो इनायत है उनकी 
कि रो भी नहीं सकते 
वरना हंसने का 
सउर हममें कहा था

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

जिक्र

मेरी बरबादीयों का 

जिक्र क्योंकर हुआ ,

यही सवाल अक्सर

मुझसे मेरे जख्म करते हैं।।


शुक्रवार, 27 मार्च 2020

अश्क

थे कभी जिनकी नजरों में 
अपने ही अक्स कि तरहां, 
आज गिरे हैं उन्हीं की 
नजरों से अश्क की तरहां ! 

नजरों से गिरे हुए अश्क की 
कीमत ही क्या है,
ये हम कभी ना समझ सके 
दीवानों की तरहां ! 

 सावन हर बार आता था 
  सबके पास मगर ,
  मैं तड़पता रहा 
सूखे रेगिस्तानो की तरहां !

 मेरे यार अब उस से 
 क्या शिकवा शिकायत करनी,
 वो तो हमें अब देखने लगे हैं 
  अनजानो की तरहां !   

'फलक ' देख गिर गया मैं 
उसकी नजर में तमाम ,
आलम भुला दिया 
जिसके लिए परवानों की तरहां !