चंद पत्ते
टूटे तो सोचा
फिज़ा छा गई
अब
बगिया वीरान हैं
तो सोचते हैं
पतझड़ अभी बाकी हैं ....
जिंदगी
आरजुओं में
बहकती गई !
और आरजू
पल-पल घुटती गई !
आरजू
मोहब्बत की हो
या दौलत की ,
कमबख्त
बहुत तड़पाती है !
हमें भरम था
कि संभाल लेंगे सब ,
और
जिंदगी की रेत की मानिंद
फिसलती हि गई !
समेट रहे थे
हम तो
मोहब्बत के फसाने ,
और
उधर जिंदगी
पल पल बिखरती गई ...।
.
तन्हा हूं
पर ऐ दिल
मेरी तनहाइयों का
जिक्र न करना
परेशां भी हूं
पर मेरी
परेशानियों का भी
जिक्र ना करना ,
मैं हारा हूं
तो अपनों की ही जीत के लिए
फलक
मेरे तरकश के तीरों का
जिक्र ना करना ,
उसे शौक सितम का है
तो बेशक करने दे
तू उससे कभी
मेरे जख्मों का
जिक्र ना करना ,
यह जो हंसने का हुनर है
ये सीखा है उसी से
तू मेरी हंसी में
छुपे दर्द का
जिक्र ना करना ,
किसी दिन
उसी का बयान था
कि वो संगीन ए जिगर है
तो संगीनों से
उम्मीद ए वफ़ा का
ज़िक्र क्योंकर करना ...।
रिस्ते
अक्सर टूट जाते हैं
साफगोसी से,
फिर भी
कम्बक्त "फलक"
से,
कहना नहीं छुटता !
जिक्र चला जब भी
मेरी बरबादीयों का,
ना जाने क्यूं
लोगों कि जुबां
से,
तेरा हि नाम
नहीं छुटता...!